भारत के ऊर्जा क्षेत्र की कहानी आज भले ही बड़े-बड़े समुद्री तेल क्षेत्रों और आधुनिक रिग्स तक पहुंच चुकी हो, लेकिन इसकी शुरुआत असम के छोटे से कस्बे डिगबोई से हुई थी। डिगबोई को भारत के तेल उद्योग का जन्मस्थान माना जाता है, जहां हुई शुरुआती खोजों ने देशभर में तेल अन्वेषण का रास्ता खोला।
डिगबोई में 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में भारत का पहला सफल तेल कुआं खोदा गया और 1889 में यहां व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। इसके बाद 1901 में एशिया की पहली तेल रिफाइनरी की स्थापना ने असम की भूमिका को और मजबूत कर दिया। इन शुरुआती प्रयासों ने यह साबित कर दिया कि भारत में पेट्रोलियम संसाधन मौजूद हैं, जिससे अन्य क्षेत्रों में भी व्यवस्थित खोज की शुरुआत हुई।
आज भारत में तेल उत्पादन कई क्षेत्रों में फैला हुआ है। पूर्वोत्तर में असम अब भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है, जहां डुलियाजन, मोरान और नाहरकटिया जैसे प्रमुख तेल क्षेत्र सक्रिय हैं। इनका संचालन मुख्यतः ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा किया जाता है।
असम के बाहर, भारत का सबसे बड़ा तेल उत्पादन क्षेत्र मुंबई हाई में स्थित है, जिसकी खोज 1974 में ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन ने की थी। इस खोज ने देश के तेल उत्पादन में बड़ा इजाफा किया और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद की।
पश्चिम भारत के गुजरात में भी कंबे बेसिन के अंतर्गत अंकलेश्वर और मेहसाणा जैसे क्षेत्रों में तेल उत्पादन होता है। वहीं दक्षिण भारत में कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन में भी तेल और गैस के भंडार पाए गए हैं, जिससे देश का ऊर्जा मानचित्र और विस्तृत हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, असम में हुई शुरुआती खोजों ने भारत की पेट्रोलियम नीति और ढांचे को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। डिगबोई की सफलता ने न केवल रिफाइनरी, पाइपलाइन और तकनीकी कौशल के विकास को बढ़ावा दिया, बल्कि 1956 में ओएनजीसी जैसी संस्थाओं की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त किया।
आज भले ही देश के अन्य हिस्सों में बड़े तेल क्षेत्र विकसित हो चुके हों, लेकिन असम का ऐतिहासिक महत्व अब भी कायम है। डिगबोई से शुरू हुई यह यात्रा आज पूरे देश में फैले तेल कुओं के विशाल नेटवर्क में बदल चुकी है, जिसने भारत के औद्योगिक विकास को नई दिशा दी है।
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