ईरान गहरी आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, क्योंकि उसकी मुद्रा रियाल 1.4 मिलियन प्रति अमेरिकी डॉलर तक गिर गई है यह गिरावट विदेशी दवाबों, प्रतिबंधों और देशभर में बढ़ रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच आई है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि कितना समय ईरान बाहरी दबाव सह सकता है।
अमेरिका और पश्चिमी देशों के सालों के आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान के आय स्रोतों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, खासकर कच्चे तेल के निर्यात को, जिस पर देश की अर्थव्यवस्था काफी निर्भर है। इन प्रतिबंधों के कारण ईरान की मुद्रा की गिरावट और महंगाई में तेज़ बढ़ोतरी देखने को मिली है। वर्तमान में एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए लगभग 1.4 मिलियन रियाल की दर लग रही है, जबकि एक भारतीय रुपये के बराबर लगभग 11,000 ईरानी रियाल के बराबर है।
रियाल में यह गिरावट देश भर में महँगी और रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतों को आसमान छूने के स्तर पर ले आई है और लोगों की क्रय शक्ति को कमजोर कर रही है। इसी वजह से तेल के व्यापारी और बाजार में कारोबारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, और कई बड़े बाजारों में दुकानें बंद हो गई हैं।
ईरान में मुद्रास्फीति भी बहुत तेज़ है, और देश के कई हिस्सों में प्रदर्शनकारी व्यापक तौर पर बाहर आ रहे हैं, जिन्हें अब सिर्फ आर्थिक समस्याओं तक सीमित न रखते हुए राजनीतिक असंतोष का स्वरूप भी दे दिया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि राष्ट्रीय आर्थिक कमजोरी, नाकाफी तेल आय और बढ़ते प्रतिबंधों ने रियाल का पतन तेज़ कर दिया है।
अगर अमेरिका किसी तरह सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह ईरान की अब तक से भी अधिक कमजोर अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल सकता है। ईरान की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में गिरावट की संभावना जताई जा रही है और देश का रक्षा बजट अमेरिकी बजट के मुकाबले बेहद छोटा है, जो अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाता है। ऐसे में तनाव और प्रतिबंधों से निपटना ईरान के लिए और भी मुश्किल हो सकता है।
वर्तमान आर्थिक हालात निर्यात में कमी, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट और घरेलू अस्थिरता के चलते — यह संकेत देते हैं कि ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक इस तरह के दबाव को प्रतिरोध नहीं कर पाएगी।
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